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जैसा कि संस्था के नाम से ही आभास हो रहा है कि ये एक प्रयास, एक पहल, एक कोशिश, एक शुरुआत है। परन्तु ये पहल, ये प्रयास, 

  • ये शुरुआत किसके लिए ?
  • कौन से हैं वो मुद्दे ?
  • किसके खिलाफ हमें ये “पहल” करनी है?
  • क्या करना है ?
  •  कौन करेगा ?
  •  कैसे करेगा ?

इस तरह के बहुत से सवाल एक साथ उठ खड़े होते हैं हमारे मस्तिष्क में।

स्वतंत्रता संग्राम के बारे में पढ़ने पर पता चलता है कि किस तरह महान क्रांतिकारियों ने अपने जीवन की बलि देकर हमें ये आजादी की जिन्दगी दी है, उन लोगों के बारे में हम सब का छोटा सा दिमाग ये सोचने पर मजबूर हो जाता है कि कितने बड़े और महान क्रांतिकारी थे वो लोग जो भारत माता को आजाद कराने के लिए बलि की वेदी पर हंसते–हंसते चढ़ गए। अपना घर, परिवार सब छोड़ कर, सुख सुविधाओं को त्याग कर, माँ भारती की बेड़ियों को तोड़ने के लिए नाचते–कूदते, ख़ुशी–खुशी फांसी के फन्दे को चूम गए। जब क्रांति का जिक्र आता है, तो उन महान बलिदानियों के नाम सामने आ जाते हैं, जैसे– वीर भगत सिंह, चन्द्रशेखर आजाद, बटुकेशवर दत्त, राजगुरू, सुखदेव, खुदीराम बोस, लाला लाजपतराय, बाल गंगाधर तिलक, विपिनचन्द्र पाल, सुभाष चन्द्र बोस, रानी लक्ष्मीबाई, तात्या टोपे और न जाने कितने ही वो अमर शहीद जिनके नाम का इतिहास में जिक्र तक नहीं है। उनके बलिदान का कर्ज आज भी हम सब पर उधार है। कहाँ से लाए थे वो लोग इतना बड़ा जिगरा ?, क्या सोच थी उनकी ?, धन्य हैं वो माता–पिता जिन्होंने उन्हें जन्म दिया !, धन्य हैं वो गाँव !, वो शहर !, वो कस्बा ! जहाँ उन्होंने जन्म लिया। धन्य हैं वो संताने जो माँ भारती को अपना ऋणी बना गए।

अब मन में रह–रह कर यह विचार आता है कि काश हमने भी उस समय जन्म लिया होता तो हम भी उन महान आत्माओं के साथ देश की आजादी की लड़ाई लड़ते। मगर दोस्तों कब, कहाँ और कैसे जन्म लेना है, ये इंसान के हाथ में नहीं है। बस इसी जद्दो-जहद के साथ हमारी पढ़ाई पूरी हो जाती है, नौकरी लग जाती है, शादी हो जाती है और फिर बच्चे भी। बस गृहस्थ आश्रम में उलझ कर रह जाती है हमारी जिन्दगी, मगर मनुष्य के विचारों की लड़ाई हमेशा जारी रहती है। दिमाग विकसित होने पर समझ में आता है कि भगतसिंह और बाकी सभी क्रांतिकारियों का मकसद सिर्फ देश को आजाद कराना ही नहीं था बल्कि आजाद हिन्दुस्तान की तस्वीर कैसी हो ?, देश का कानून कैसा हो ?, जातिवाद का जहर न फैले ?, एक शिक्षित और महान भारत कैसा हो ?, आय का समान बटवारा हो, अमीर–गरीब का फासला खत्म हो। ये सब मुद्दे भी उस महान लड़ाई का ही तो हिस्सा थे। 15 अगस्त, 1947 को भारत आजाद तो हो गया परन्तु सही मायने में आजादी तो आज भी नहीं मिली है।

ठीक है हम आजादी की लड़ाई में हिस्सा ना ले पाये हों, परन्तु आज के हालात तो उस समय से भी बदतर हैं। उस समय सिर्फ एक मकसद था– भारत माँ की आजादी। परन्तु आज के आजाद भारत में तो हजारों बुराईयाँ मुँह फाड़े खडी हैं। आज हमें मकसद मिल चुका है– एक और सम्पूर्ण आजादी की लड़ाई लड़ने का अब हिंदुस्तान को जरूरत है एक सम्पूर्ण क्रांति की और शहीदे आजम सरदार भगत सिंह जी के अनुसार हमे क्रांति का मतलब समझने की आवश्य्कता है  –

“हमें स्पष्ट कर देना चाहिए कि क्रांति का मतलब मात्र उथल पुथल या एक खुनी संघर्ष नहीं है। जब हम क्रांति की बात करते हैं तो उसमें मौजूदा हालात को पूरी तरह ध्वंस करने के बाद समाज के व्यवस्थित पुनर्गठन के कार्यक्रम की बात निहित है। क्रांतिकारी  लोग बर्बादी और तबाही में सुख अनुभव करने वाले खून के प्यासे दानव नहीं होते।आपको यह पता होना चाहिए कि क्रांति का मतलब गतिविधि है। इसका मतलब संगठित व क्रमबद्ध काम द्वारा सोची-समझी तबदीली लाना है।”

  • ये क्रांति है भ्रष्टाचार के खिलाफ, जातिवाद के खिलाफ, धर्म के नाम पर कटते समाज के खिलाफ।
  • ये क्रांति लानी है हमें अपने ही आस्तीन में छुपे हुये जयचन्दों के खिलाफ।
  • ये क्रांति लानी है हमें अभिव्यक्ति की आजादी की आड़ में भारत माँ के टुकड़े करने वाले शिक्षित नौजवानो के खिलाफ।
  • ये क्रांति लानी है हमें गरीबी से बदहाल, खुदखुशी करते किसान के लिए।
  • ये क्रांति लानी है हमें समाज में फैली कुरीतियों के खिलाफ।
  • ये क्रांति लानी है हमें गर्भ में पल रही कन्या भ्रूण के लिए।
  • ये क्रांति लानी है हमें आरक्षण के नाम पर बँटते समाज के लिए।
  • ये क्रांति लानी है हमे आय के असामान बटवारे के खिलाफ ताकि गरीब और अमीर के बीच की खाई को पाटा जा सके।

और भी बहुत सी बड़ी बुराइयाँ हैं जिनके खात्मे के लिए एक और क्रांति की आवश्यकता है – क्रांति से मेरा मतलब सम्पूर्ण क्रांति से है, और सम्पूर्ण क्रांति से मेरा मतलब जन नायक “जय प्रकाश नारायण” के वैचारिक उद्घोष से है –
जय प्रकाश नारायण ने सम्पूर्ण क्रांति को निम्नलिखित तरह से वर्गीकृत किया है –

– आध्यात्मिक क्रांति
– धार्मिक क्रांति
– शैक्षणिक क्रांति
– सांस्कृतिक क्रांति
– सामाजिक क्रांति
– आर्थिक क्रांति
– राजनैतिक क्रांति

किसी भी बुराई को जड़ से खत्म करने के लिए एक शुरुआत करनी पड़ती है, और हमारी इस शुरुआत का नाम है– ‘‘प्रयास– एक पहल’’।
दोस्तों हम अकेले कुछ नहीं कर सकते और ना ही ये लड़ाई हमारे अकेले की है। ये संघर्ष हम सबका है और हम सब मिलकर ही इसे आगे बढ़ा सकते हैं। “प्रयास – एक पहल” को आप सभी साथियों का सहयोग चाहिए, या यूँ कह दूँ कि जिस देश ने आपको सब कुछ दिया है उस देश को आपकी जरूरत है। हम ये नही कह रहे कि अपनी संस्था के माध्यम से हम पूरे भारत वर्ष को बदल देंगे, मगर हम ये जरूर जानते हैं कि पूरा भारत नहीं, पूरा प्रदेश नहीं, कम से कम हम अपने जिले से तो शुरूआत कर ही सकते हैं, जिले से भी ना सही तो कम से कम हम अपने अपने क्षेत्र से तो शुरूआत कर ही सकते हैं। चलो क्षेत्र से भी ना सही, हम अपने आपसे तो शुरुआत कर सकते हैं।

हमारा मकसद बहुत ही पवित्र है और हमें जरूरत है एकजुटता की,आपसी सहयोग की और कन्धे से कन्धा मिलाकर चलने की।

मुझे उम्मीद ही नहीं पूर्ण विश्वास है कि ये सूरत एक न एक दिन बदलेगी और– हमारा भारत फिर से सर्वश्रेष्ठ होगा – सर्वोत्तम होगा – विश्वगुरु होगा ।

जय हिन्द ! जय भारत !!
इंकलाब जारी रहेगा …

मनजीत महलावत
प्रधान सेवक व संस्थापक (प्रयास एक पहल )