सदस्य बनने के लिए यहाँ क्लिक करे । निःशुल्क रक्तदान सेवा | निःशुल्क एम्बुलेंस सेवा । निःशुल्क क़ानूनी सहायता । सेवाओं के लिए संपर्क करे -1800 -8896 -220

प्रकृति की ओर

जीवन सदियों से प्रकृति की गोद में फलता-फूलता रहा है। प्रकृति से ऋषि-मुनियों ने आध्यात्मिक चेतना ग्रहण की और इसी के सौन्दर्य से मुग्ध होकर न जाने कितने कवियों की आत्मा से कविताएँ फूट पड़ीं। वस्तुतः मानव और प्रकृति के बीच बहुत गहरा सम्बन्ध है। दोनों एक-दूसरे के पूरक हैं। मानव अपनी भावाभिव्यक्ति के लिए प्रकृति की ओर देखता है और उसकी सौन्दर्यमयी बलवती जिज्ञासा प्रकृति सौन्दर्य से विमुग्ध होकर प्रकृति में भी सचेत सत्ता का अनुभव करने लगती है।

हमारे धार्मिक ग्रंथ, ऋषि-मुनियों की वाणियाँ, कवियों की काव्य रचनाएँ, सन्तों-साधुओं के अमृत वचन सभी प्रकृति की महत्ता से भरी पड़ी हैं। विश्व की लगभग सारी सभ्यता का विकास प्रकृति की ही गोद में हुआ और तब इसी से मनुष्य के रागात्मक सम्बन्ध भी स्थापित हुए, किन्तु कालान्तर में हमारी प्रकृति से दूरी बढ़ती गई। इसके फलस्वरूप विघटनकारी रूप भी सामने आए। मत्स्यपुराण में प्रकृति की महत्ता को बतलाते हुए कहा गया है- “सौ पुत्र एक वृक्ष समान”।

प्रकृति के संरक्षण का हम अथर्ववेद में शपथ खाते हैं- ‘हे धरती माँ, जो कुछ भी तुमसे लूँगा, वह उतना ही होगा जितना तू पुनः पैदा कर सके। तेरे मर्मस्थल पर या तेरी जीवन शक्ति पर कभी आघात नहीं करूँगा।’ मनुष्य जब तक प्रकृति के साथ किए गए इस वादे पर कायम रहा सुखी और सम्पन्न रहा, किन्तु जैसे ही इसका अतिक्रमण हुआ, प्रकृति के विध्वंसकारी और विघटनकारी रूप उभर कर सामने आए। सैलाब और भूकम्प आया। पर्यावरण में विषैली गैसें घुलीं। मनुष्य का आयु कम हुआ। धरती एक-एक बूँद पानी के लिए तरसने लगी, लेकिन यह वैश्विक तपन हमारे लिए चिन्ता का विषय नहीं बना।

स्मरण रखिए, प्रकृति किसी के साथ भेदभाव या पक्षपात नहीं करती। इसके द्वार सबके लिए समान रूप से खुले हैं, लेकिन जब हम प्रकृति से अनावश्यक खिलवाड़ करते हैं तब उसका गुस्सा भूकम्प, सूखा, बाढ़, सैलाब, तूफान की शक्ल में आता है, फिर लोग काल के गाल में समा जाते हैं।

विज्ञान जिस प्रकार प्रगति कर रहा है, उसी के दुष्परिणाम स्वरूप हमारी प्रकृति दूषित होती जा रही है। चारों ओर वाहनों का बढ़ता शोर, वृक्षों की कटाई, औद्योगिक इकाइयों में वृद्धि, स्वच्छता की भावना में कमी आदि हमारे पर्यावरण को दूषित कर रहे हैं। मनुष्य प्रकृति का अभिन्न अंग है। अपने जीवन की सभी प्रकार की आवश्यकताओं के लिए वह प्रकृति पर निर्भर है। परंतु अपनी असीमित आवश्यकताओं की पूर्ति करने के लिए वह प्रकृति का दोहन करने पर जुटा हुआ है।इसका कुपरिणाम है बढ़ता हुआ प्रदूषण। यदि पर्यावरण प्रदूषित हो तो जीवन बीमारियों और कठिनाइयों से भर जाता है। पर्यावरण की रक्षा के लिए हम महत्त्वपूर्ण योगदान दे सकते हैं। यदि हर नागरिक सजग हो तो पर्यावरण प्रदूषित होगा ही नहीं। प्रदूषित वातावरण इंसानों के लिए ही नहीं जानवरों और पक्षियों के लिए भी खतरनाक है।

सदस्य बनने के लिए यहाँ क्लिक करे

वृक्षारोपण के फायदे 

  1. सर्वप्रथम लाभ तो ‘वृक्ष’ शब्द से ही लगने लगता है, क्योकि वृक्ष से केवल और केवल लाभ ही होता है।
  2. वृक्ष, वातावरण मे फैली दूषित वायु को शुद्ध करता है ।
  3. वर्षा ऋतु में वर्षा वायु को रोकता है, जिससे वर्षा की सम्भावना अधिक होती है ।
  4. वृक्ष अपने जड़ों मे मिट्टी को बांधकर रखता है, जिससे मृदा अपरदन नहीं होता है ।
  5. वृक्ष अपने आसपास के वातावरण (दूषित वायु की स्वच्छता) के साथ साथ भूमि को भी ठंडा रखता है, वर्तमान मे सबसे बड़ी मुसीबत ग्लोबल वार्मिंग की समस्या से कम से कम थोड़ी ही सही पर राहत जरुर दिलायेगा।
  6. वृक्षारोपण यदि एक क्रम मे किया जाये तो सुन्दरता की झलक प्रदर्शित करता है ।
  7. एक ओर वायु को स्वच्छ बनाता है तो दूसरी ओर इन वृक्षों को देवताओ का निवास बताया गया है जिन्हें भारतीय संस्कृति मे बड़ा महत्व है।
  • बरगद मे समस्त देवताओं का निवास बताया गया है, मुख्य रूप से ब्रह्मा जी का,
  • पीपल मे विष्णु जी का वास होना माना गया है,
  • नीम मे माँ दुर्गा का निवास स्थान बताया गया है

विभिन्न वृक्षों के छाल, बीज, फल. पत्ते कई प्रकार की दवाइयों मे उपयोग किये जाते है जैसे – नीम के पत्तो को पानी मे उबालकर नहाने से शरीर के रोग दूर होते है, इसी प्रकार उसके डालियां दातुन के रूप मे उपयोग किया जाता है, यह एक आयुर्वेदिक औषधि है।

सदस्य बनने के लिए यहाँ क्लिक करे

जन भागीदारी से जल संरक्षण

हमारे देश के पुरखों से हमें अनेक प्रकार के जलस्रोत विरासत में मिले हैं। यदि हमने इस विरासत को संभाल कर नहीं रखा तो आने वाली पीढ़ियाँ हमें माफ नहीं करेंगी। हमारे देश के गाँव-गाँव में परम्परागत कुएँ, बावड़ी व तालाब बने हुए हैं। पिछले वर्षों में लम्बे समय से हम इनकी अनदेखी करते आ रहे हैं। इन्हें या तो तोड़फोड़ दिया गया है या प्राकृतिक रूप से नष्ट हो गए हैं। आगे से इन जलस्रोतों की चिन्ता सभी मिलाकर करेंगे तभी जल संकट से निजात मिल सकेगी। हमने अपने ही स्वार्थ में इन्हेें उजाड़कर कंकरीट का जंगल बिछा दिया है। जनता ने जल पूर्ति की जिम्मेदारी अपने कंधों से उतारकर सरकार के कंधों पर रख दी है। जबकि सरकारें योजनाएँ बनाने तक सीमित हो जाती हैं क्योंकि इन्हें कारगर ढंग से लागू करने में लोगों के स्वार्थ आड़े आते हैं।

गाँव-गाँव और शहर-शहर में बने हुए जलस्रोतों का पुनरुद्धार किया जाना आवश्यक है। मोहल्ले, गाँव, शहर जहाँ भी ऐसे स्रोत हैं वहाँ के लोग मिलकर इन जलस्रोतों की जिम्मेदारियाँ अपने ऊपर लें। मिलकर इनमें जमा कूड़े-कचरे, मिट्टी, कंकड़, झाड़-झंखर को हटाएँ। जलस्रोतों के जल मार्ग में आने वाले अवरोध व नाजायज कब्जे हटाएँ। जलस्रोतों के रखरखाव में अपनी व दूसरे लोगों की भागीदारी सुनिश्चित किए जाने की आवश्यकता है। अब तक जो भूलें हमने की है उनका समाधान भी हमें मिलजुल कर ही करना है। हम एक-एक मिलकर अनेक बन सकते हैं। जब इतने हाथ श्रमदान करेंगे तो जलस्रोत अवश्य साफ रहेंगे। उन्हें गंदा करने से भी बचाएँगे। इस कथन पर काम करना है साथी हाथ बटाना, एक अकेला थक जाएगा तो मिलकर बोझ उठाना।

भारत में उपलब्ध जल संसाधन की दृष्टि से आकलन करें तो यह बात सामने आती है कि 2001 में प्रति व्यक्ति 1800 क्यूबिक मीटर पानी उपलब्ध था जो 2050 ई. में घटकर 1000 क्यूबिक मीटर हो जाएगा। भारत इस समय कृषि उपयोग हेतु तथा पेयजल के गंभीर संकट से गुजर रहा है और यह संकट वैश्विक स्तर पर साफ दिख रहा है। हर विकसित और विकासशील देश इस संकट को दूर करने हेतु हर तरह से उपाय पर विचार कर रहा है। इस संकट के निवारण हेतु हमें तीन स्तरों पर विचार करना होगा-पहला यह कि अब तक हम जल का उपयोग किस तरह से करते थे? दूसरा भविष्य में कैसे करना है? तथा जल संरक्षण हेतु क्या कदम उठाए? पूरी स्थिति पर नजर डालें तो यह तस्वीर उभरती है कि अभी तक हम जल का उपयोग अनुशासित ढंग से नहीं करते थे तथा जरूरत से ज्यादा जल का नुकसान करते थे। संरक्षण की जागरूकता रहने से इस स्थिति में जल संरक्षण हेतु हमें कई कदम उठाने होंगे जो इस प्रकार हैं-

  • हर नागरिक में जल संरक्षण हेतु जागरूकता लानी होगी।
  • हर नागरिक शावर की जगह बाल्टी में पानी भरकर स्नान करें।
  • सेविंग करते समय नल बंद रखें।
  • बर्तन धुलते समय नल के स्थान पर टब का प्रयोग करें।
  • उत्तराखंड जल संसाधन के अनुसार, ‘‘टॉयलेट में लगी फ्लश की टंकी में प्लास्टिक की बोतल में पानी भरकर रख देने से हर बार एक लीटर जल बचाया जा सकता है।
  • गाँव और शहरों में पहले तालाब हुआ करते थे जिनमें जल एकत्र रहता था जो न केवल पानी के स्तर को आस-पास बचाये रखता था बल्कि दैनिक उपयोग के काम आता था। आज गाँवों और शहरों के तालाबों को पाट कर घर बना लिये गए हैं। अतः जरूरी है कि जल संरक्षण हेतु गाँव और शहरों में तालाब फिर से खोदे जाएँ।
  • गंदे जल का सिंचाई में उपयोग करके भी जल संरक्षण किया जा सकता है।
  • वर्षा का जल छत पर संरक्षण कर उसका उपयोग करना। इसलिये छत पर पानी टंकी बनाना होगा।
  • सार्वजनिक स्थल के नल की टोटी अक्सर खराब रहती है उसकी मरम्मत कर तथा लोगों में जागरूकता लाकर हजारों लीटर पानी संरक्षित किया जा सकता है।
  • पर्यावरण के प्रति जागरूकता जरूरी है क्योंकि पर्यावरण संतुलन का सकारात्मक प्रभाव जल संरक्षण पर पड़ता है। कटते वृक्षों के कारण भूमि की नमी लगातार कम हो रही है जिससे भूजल स्तर पर बुरा असर पड़ रहा है। अतः जरूरी है कि वृक्षारोपण कार्यक्रम हेतु जागरूकता लाई जाए।
  • नदियों के जल में गंदा पानी कदापि नहीं छोड़ा जाय जिससे जरूरत पर उस जल का प्रयोग पीने तथा अन्य उपयोगों हेतु किया जा सके।
  • ‘जल संरक्षण’ विषय को व्यापक अभियान की तरह सरकारी और गैर सरकारी दोनों स्तरों पर प्रचारित करने की जरूरत है। जिससे छोटे, बड़े सभी इस विषय की गंभीरता को समझें और इस अभियान में अपनी भूमिका अदा करें।
  • विद्यालय और महाविद्यालयों में निरंतर प्रचार-प्रसार की जरूरत है। जिससे युवा पीढ़ी समय रहते इसकी गंभीरता को अच्छी तरह से समझ सकें।
  • जल संरक्षण हेतु रेनवाटर हार्वेस्टिंग तकनीक का सहारा लेना चाहिए। यह तकनीक पानी की कमी से निपटने का तरीका भर नहीं है, कई बार तो ऐसा देखने में आया है कि इस तकनीक से इतना जल एकत्र हो जाता है कि दूसरे स्रोत की आवश्यकता ही नहीं पड़ती और यहाँ तक कि दूसरे को पानी उधार देने में सक्षम हो जाते हैं। इस तरह का उदाहरण हमें केरल में जिला पंचायत के कार्यालय में देखने को मिला है। सूत्रों से ज्ञात होता है कि 9 अगस्त, 2005 से केरल के कासरागोड जिला पंचायत का सरकारी भवन न तो बोरवेल पर निर्भर है न तो जलापूर्ति या भूजल पर, पानी की जरूरतों के लिये इसका भरोसा सिर्फ बारिश से मिले पानी पर है। इस बात के पर्याप्त सबूत हैं कि अपनी आवश्यकता का सारा पानी यह छत पर एकत्र वर्षा जल से हासिल कर लेता है।

निष्कर्षतः ‘जल संरक्षण’ आज के पूरे विश्व की मुख्य चिंता है। प्रकृति हमें निरंतर वायु, जल, प्रकाश आदि शाश्वत गति से दे रही है लेकिन हम विकास की आंधी में बराबर प्रकृति का नैसर्गिक संतुलन बिगाड़ते जा रहे हैं। जल संरक्षण हेतु समय रहते चेत जाने की जरूरत है क्योंकि-

“रहिमन पानी राखिए, बिन पानी सब सून
पानी गए न उबरे, मोती, मानुस, चून”।